ham bhi firte hain yak hashm le kar | हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर

  - Meer Taqi Meer

हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर
दस्ता-ए-दाग़-ओ-फ़ौज-ए-ग़म ले कर

दस्त-कश नाला पेश-रौ गिर्या
आह चलती है याँ इल्म ले कर

मर्ग इक माँदगी का वक़्फ़ा है
या'नी आगे चलेंगे दम ले कर

उस के ऊपर कि दिल से था नज़दीक
ग़म-ए-दूरी चले हैं हम ले कर

तेरी वज़-ए-सितम से ऐ बे-दर्द
एक आलम गया अलम ले कर

बारहा सैद-गह से उस की गए
दाग़-ए-यास आहु-ए-हरम ले कर

ज़ोफ़ याँ तक खिंचा कि सूरत-गर
रह गए हाथ में क़लम ले कर

दिल पे कब इक्तिफ़ा करे है 'इश्क़
जाएगा जान भी ये ग़म ले कर

शौक़ अगर है यही तो ऐ क़ासिद
हम भी आते हैं अब रक़म ले कर

'मीर'-साहिब ही चूके ए बद-अहद
वर्ना देना था दिल क़सम ले कर

  - Meer Taqi Meer

Duniya Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meer Taqi Meer

As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

Similar Writers

our suggestion based on Meer Taqi Meer

Similar Moods

As you were reading Duniya Shayari Shayari