ham se kuchh aage zamaane men hua kya kya kuchh | हम से कुछ आगे ज़माने में हुआ क्या क्या कुछ

  - Meer Taqi Meer

हम से कुछ आगे ज़माने में हुआ क्या क्या कुछ
तो भी हम ग़ाफ़िलों ने आ के क्या क्या कुछ

दिल जिगर जान ये भसमनत हुए सीने में
घर को आतिश दी मोहब्बत ने जला क्या क्या कुछ

क्या कहूँ तुझ से कि क्या देखा है तुझ में मैं ने
इशवा-ओ-ग़मज़ा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा क्या क्या कुछ

दिल गया होश गया सब्र गया जी भी गया
शग़्ल में ग़म के तिरे हम से गया क्या क्या कुछ

आह मत पूछ सितमगार कि तुझ से थी हमें
चश्म-ए-लुतफ़-ओ-करम-ओ-महर-ओ-वफ़ा क्या क्या कुछ

नाम हैं ख़स्ता-ओ-आवारा-ओ-बदनाम मिरे
एक आलम ने ग़रज़ मुझ को कहा क्या क्या कुछ

तरफ़ा-ए-सोहबत है कि सुनता नहीं तू एक मिरी
वास्ते तेरे सुना मैं ने सुना क्या क्या कुछ

हसरत-ए-वसल-ओ-ग़म-ए-हिजर-ओ-ख़्याल-ए-रुख़-ए-दोस्त
मर गया मैं पे मिरे जी में रहा क्या क्या कुछ

दर्द-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुल्फ़त-ए-ग़म दाग़-ए-फ़िराक़
आह आलम से मिरे साथ चला क्या क्या कुछ

चश्म-ए-नमनाक-ओ-दिल पर जिगर सद-पारा
दौलत-ए-इश्क़ से हम पास भी था क्या क्या कुछ

तुझ को क्या बनने बिगड़ने से ज़माने के कि याँ
ख़ाक किन किन की हुई सिर्फ़ बना क्या क्या कुछ

क़िबला-ओ-काबा ख़ुदा-वंद-ओ-मलाज़-ओ-मुशफ़िक़
मुज़्तरिब हो के उसे मैं ने लिखा क्या क्या कुछ

पर कहूँ क्या रक़म शौक़ की अपने तासीर
हर सर-ए-हर्फ़ पे वो कहने लगा क्या क्या कुछ

एक महरूम चले 'मीर' हमें आलम से
वर्ना आलम को ज़माने ने दिया क्या क्या कुछ

  - Meer Taqi Meer

Udasi Shayari

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