क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
यक जान ओ सद तमन्ना यक दिल हज़ार ख़्वाहिश
ले हाथ में क़फ़स टुक सय्याद चल चमन तक
मुद्दत से है हमें भी सैर-ए-बहार ख़्वाहिश
ने कुछ गुनह है दिल का ने जुर्म-ए-चश्म इस में
रखती है हम को इतना बे-इख़्तियार ख़्वाहिश
हालाँकि 'उम्र सारी मायूस गुज़री तिस पर
क्या क्या रखें हैं उस के उम्मीद-वार ख़्वाहिश
ग़ैरत से दोस्ती की किस किस से हो जे दुश्मन
रखता है यारी ही की सारा दयार ख़्वाहिश
हम मेहर ओ रज़ क्यूँँ कर ख़ाली हों आरज़ू से
शेवा यही तमन्ना फ़न ओ शिआर ख़्वाहिश
उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत
दरिया को है ये किस का बोस ओ कनार ख़्वाहिश
सद रंग जल्वा-गर है हर जादा ग़ैरत गुल
आशिक़ की एक पावे क्यूँँ कर क़रार ख़्वाहिश
यक बार बर न आए उस से उम्मीद दिल की
इज़हार करते कब तक यूँँ बार बार ख़्वाहिश
करते हैं सब तमन्ना पर 'मीर' जी न इतनी
रक्खेगी मार तुम को पायान-ए-कार ख़्वाहिश
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer
our suggestion based on Meer Taqi Meer
As you were reading Corruption Shayari Shayari