na phir rakkhenge teri rah men pa ham | न फिर रक्खेंगे तेरी रह में पा हम

  - Meer Taqi Meer

न फिर रक्खेंगे तेरी रह में पा हम
गए-गुज़रे हैं आख़िर ऐसे क्या हम

खिंचेगी कब वो तेग़-ए-नाज़ यारब
रहे हैं देर से सर को झुका हम

न जाना ये कि कहते हैं किसे प्यार
रहें बे-लुत्फ़ियाँ ही याँ तो बाहम

बने क्या ख़ाल-ओ-ज़ुल्फ़-ओ-ख़त से देखें
हुए हैं कितने ये काफ़िर फ़राहम

मरज़ ही 'इश्क़ का बे-डोल है कुछ
बहुत करते हैं अपनी सी दवा हम

कहीं पैवंद हूँ यारब ज़मीं के
फिरेंगे उस से यूँँ कब तक जुदा हम

हवस थी 'इश्क़ करने में व-लेकिन
बहुत नादिम हुए दिल को लगा हम

कब आगे कोई मरता था किसी पर
जहाँ में कर गए रस्म-ए-वफ़ा हम

तआ'रुफ़ क्या रहा अहल-ए-चमन से
हुए इक 'उम्र के पीछे रिहा हम

मुआ जिस के लिए उस को न देखा
न समझे 'मीर' का कुछ मुद्दआ' हम

  - Meer Taqi Meer

Ulfat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meer Taqi Meer

As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

Similar Writers

our suggestion based on Meer Taqi Meer

Similar Moods

As you were reading Ulfat Shayari Shayari