hamaare saamne tera jab kisoo ne naam liya | हमारे सामने तेरा जब किसू ने नाम लिया

  - Meer Taqi Meer

हमारे सामने तेरा जब किसू ने नाम लिया
दिल ए सितमज़दा को हमने थाम थाम लिया

  - Meer Taqi Meer

Dil Shayari

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    दिल को तेरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
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As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

    बे-यार शहर दिल का वीरान हो रहा है
    दिखलाई दे जहाँ तक मैदान हो रहा है

    इस मंज़िल-ए-जहाँ के बाशिंदे रफ़तनी हैं
    हर इक के हाँ सफ़र का सामान हो रहा है

    अच्छा लगा है शायद आँखों में यार अपनी
    आईना देख कर कुछ हैरान हो रहा है

    गुल देख कर चमन में तुझ को खिला ही जा है
    या'नी हज़ार जी से क़ुर्बान हो रहा है

    हाल-ए-ज़बून अपना पोशीदा कुछ न था तो
    सुनता न था कि ये सैद बे-जान हो रहा है

    ज़ालिम इधर की सुध ले जूँ शम-ए-सुब्ह-गाही
    एक आध दम का आशिक़ मेहमान हो रहा है

    क़ुर्बां-गह-ए-मोहब्बत वो जा है जिस में हर सू
    दुश्वार जान देना आसान हो रहा है

    हर शब गली में उस की रोते तो रहते हो तुम
    इक रोज़ 'मीर' साहब तूफ़ान हो रहा है
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    Meer Taqi Meer
    मक्का गया मदीना गया कर्बला गया
    जैसा गया था वैसा ही चल फिर के आ गया

    देखा हो कुछ उस आमद-ओ-शुद में तो मैं कहूँ
    ख़ुद गुम हुआ हूँ बात की तह अब जो पा गया

    कपड़े गले के मेरे न हों आब-दीदा क्यूँ
    मानिंद-ए-अब्र दीदा-ए-तर अब तो छा गया

    जाँ-सोज़ आह ओ नाला समझता नहीं हूँ मैं
    यक शो'ला मेरे दिल से उठा था जला गया

    वो मुझ से भागता ही फिरा किब्र-ओ-नाज़ से
    जूँ जूँ नियाज़ कर के मैं उस से लगा गया

    जोर-ए-सिपहर-ए-दूँ से बुरा हाल था बहुत
    मैं शर्म-ए-ना-कसी से ज़मीं में समा गया

    देखा जो राह जाते तबख़्तुर के साथ उसे
    फिर मुझ शिकस्ता-पा से न इक-दम रहा गया

    बैठा तो बोरिए के तईं सर पे रख के 'मीर'
    सफ़ किस अदब से हम फ़ुक़रा की उठा गया
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    Meer Taqi Meer
    मैं भी दुनिया में हूँ इक नाला-परेशाँ यक जा
    दिल के सौ टुकड़े मिरे पर सभी नालाँ यक जा

    पंद-गोयों ने बहुत सीने की तदबीरें लीं
    आह साबित भी न निकला ये गरेबाँ यक जा

    तेरा कूचा है सितमगार वो काफ़िर जागह
    कि जहाँ मारे गए कितने मुसलमाँ यक जा

    सर से बाँधा है कफ़न इश्क़ में तेरे या'नी
    जम्अ' हम ने भी किया है सर-ओ-सामाँ यक जा

    क्यूँके पड़ते हैं तिरे पाँव नसीम-ए-सहरी
    उस के कूचे में है सद गंज-ए-शहीदाँ यक जा

    तू भी रोने को मिला दिल है हमारा भी भरा
    होजे ऐ अब्र बयाबान में गिर्यां यक जा

    बैठ कर 'मीर' जहाँ ख़ूब न रोया होवे
    ऐसी कूचे में नहीं है तिरे जानाँ यक जा
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    Meer Taqi Meer
    शायद उस सादा ने रखा है ख़त
    कि हमें मुत्तसिल लिक्खा है ख़त

    शौक़ से बात बढ़ गई थी बहुत
    दफ़्तर उस को लिखें हैं क्या है ख़त

    नामा कब यार ने पढ़ा सारा
    न कहा ये भी आश्ना है ख़त

    साथ हम भी गए हैं दूर तलक
    जब उधर के तईं चला है ख़त

    कुछ ख़लल राह में हुआ ऐ 'मीर'
    नामा-बर कब से ले गया है ख़त
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    Meer Taqi Meer
    सैर कर अंदलीब का अहवाल
    हैं परेशाँ चमन में कुछ पर-ओ-बाल

    तब-ए-ग़म तो गई तबीब वले
    फिर न आया कभू मिज़ाज-ए-बहाल

    सब्ज़ा-नौ-रस्ता रहगुज़ार का हूँ
    सर उठाया कि हो गया पामाल

    क्यूँ न देखूँ चमन को हसरत से
    आशियाँ था मिरा भी याँ पर-साल

    सर्द-मेहरी की बस-कि गुल-रू ने
    ओढ़ी अब्र-ए-बहार ने भी शाल

    हिज्र की शब को याँ तईं तड़पा
    कि हुआ सुब्ह होते मेरा विसाल

    हम तो सह गुज़रे कज-रवी तेरी
    न निभे पर ऐ फ़लक ये चाल

    दीदा-ए-तर पे शब रखा था 'मीर'
    लुक्का-ए-अब्र है मिरा रूमाल
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    Meer Taqi Meer

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