"तन्हाई"
एक शाम जब दोस्तों से मिल कर घर लौटा मैं, अपने कमरे में गया तो देखा के तन्हाई टेबल पर रखी मेरी डाइरी पे सर रखे रो रही है।
मुझे बेहद हैरानी हुई के जो मुकम्मल ज़माने को रुला सकती है, आज ख़ुद उसे ही क्यूँ उदासी मुयस्सर है। में उस के पास गया ये सोच कर के शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ
मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, उस के आँसू पोछे, साथ में कुर्सी डाल कर मैं भी बैठा, दिलासा देने की कोशिश की और फिर पूछा के आख़िर तुम क्यूँ रो रहे हो, और फिर उस के वो लफ्ज़ मेरे ज़ेहन में बैठ गए, उस ने कहा "मेरे साथ कोई रहना नहीं चाहता, किसी को मैं पसंद नहीं, कोई मुझ से बात नहीं करता, किसीको दोस्त चाहिए, किसीको मोहब्बत, किसी को परिवार, लेकिन मेरे साथ कोई दो पल भी गुज़ारना नहीं चाहता और अब तो तू ने भी दोस्त बना लिए हैं, तुझे भी कहाँ है अब ज़रूरत मेरी, याद है जब मेरी ख़ामोशी के चलते भी तू मुझ से घंटों बातें किया करता था, रात-रात भर मुझ ही पर लिखा करता था, तेरी ये डाइरी आज भी मेरी नाम से भरी पड़ी है, इस के हर काग़ज़ पर लफ्ज़ कोई और हो न हो "तन्हाई" ज़रूर है
उस रोज़ मुझ पर तन्हाई के अस्ल मानी खुले और मैं समझा के तन्हा तो ख़ुद तन्हाई भी नहीं रहना चाहती















