मेरी फ़ितरत नहीं भूल जाऊँ उसे जो मुक़द्दर में मेरे लिखा ही न होलाख हक़ में न हो पर मुझे चाहिए आसमानों का रुख़ वो दहकता हुआ— Moni Gopal Tapish