सदा-ए-क़ैस, मुसलसल है यार हैरत हकि इश्क़ उज़्वे मुअत्तल है यार हैरत है
हमारे अज़्म से रौशन है आलम-ए-उल्फत
हमी पे हिज्र मुनज़्ज़ल है यार हैरत है
हमें तो लफ्ज़-ए-दिफा सोचने पे पाबन्दी
तुम्हारा इश्क़ मुदललल है यार हैरत है
सना-ए-हुस्न को अल्फाज़ से है कासिर अक़्ल
सियाह साया मुजम्मल है यार हैरत है
हमारे खित्ता-ए-अफ्कार पे फसील नहीं
तुम्हारा क़ल्ब मुक़फ्फल है यार हैरत है
जिसे विसाल के मआ'नी पता नहीं मोहसिन
उसी से इश्क़ मुकम्मल है यार हैरत है
— Mohsin Shaikh















