हम सब को इसी हैरत में मर जाना है
कि मर के फिर किधर जाना है
अच्छा हो गर हो बैचेनी का कोई सबब
ये क्या कि पता ही नहीं क्या पाना है
मेरे पास रखे हैं बहुत से काग़ज़ के फूल
क्या तुम्हारी नजर में कोई बुतख़ाना है
एक तो गिला न कर सका बारिशों का
और उस पर शौक तो ये है कि नहाना है
क्या कभी शाम की आँखों में तुम ने
डूबते सूरज के दर्द को पहचाना है
— Murli Dhakad















