मुजाहिद की दास्तान है ख़्वाब मेरे
उम्र भर की थकान है ख़्वाब मेरे
परिंदे तो सभी है पिंजरों में क़ैद
पतंगों का आसमान है ख़्वाब मेरे
जहाँ सभी मुसाफिर थक हार के पहुंचे
जन्नतों का शमशान है ख़्वाब मेरे
मैं इस मकाँ से उस मकाँ में दर-ब-दर
दीवारों के दरमियान है ख़्वाब मेरे
रात भी बदल के सुब्ह हो गई
अब तलक वीरान है ख़्वाब मेरे
— Murli Dhakad















