बज़्म-ए-जानाँ की रंगत कुछ ख़ास है
लेकिन आज रिन्द की तबीअत उदास है
कितनी आसान है आदमी की शक्ल
पढ़ता हूँ कि हर चेहरा उदास है
हम नाचते गाते हुए आते थे कभी
आज स्कूल से आते हुए बच्चे उदास है
फूलों के चाहने वाले के शौक को देख
मुस्कुराती हुई हर कली उदास है
नए ख़्वाब की ता'बीर हो चुकी है
आँखों में पुरानी एक तस्वीर उदास है
— Murli Dhakad















