उसूल अलग हैं जमीन और दलदल के
कमल को छूना मगर ज़रा संभल के
अवतार बदल के जो आ जाती है कभी ख़ुशबू
हम ये कह देते हैं आओ कपड़े बदल के
इसी पल में वो मारे जाएँगे बेचारे
मुन्तज़िर थे जो उम्र भर इसी पल के
कौन सा जमाना आप ने देख लिया है
मेरी आँखों में सभी मंज़र हैं आजकल के
अजीब हैं कि अजीब होना नहीं चाहते
रखते हैं जो अपनी शख़्सियत बदल के
— Murli Dhakad















