मरने का है ख़याल ना जीने की आरज़ू
बस है मुझे तो वस्ल के मौसम की जुस्तजू
इक शाहे दीं का ग़म ही बहुत है मेरे लिए
रोता है दिल मेरा, मेरी आँखें हैं आब-जु
अब चाहिए ज़माने को जानी दवा-ए-इश्क
नफ़रत की फैलती है वबा आज चार-सु
इक ख़्वाब जो अधुरा है आँखों में आज-तक
ऐ काश के तू जानता है वो ही ख़्वाब तू
तुम साहिल-ए-खुशी पे सुकूँ याब हो, रहो
देखो मैं ग़र्क दरिया-ए-ग़म में हूँ ता-गुलु
— Muzammil Raza















