धुँधला गया हूँ दूर के मंज़र में जा के मैं

पछता रहा हूँ शह्‌र से क़स्बे में आ के मैं

अब उस कली पे सिर्फ़ मिरा हक़ है दोस्तो
लौटा हूँ हाथ पेड़ को पहले लगा के मैं

शो'ला दिए को ज़िन्दगी देते ही बुझ गया
मंज़र से हट गया उसे मंज़र पे ला के मैं

साहब यक़ीन कीजिए चोरी की ख़ू नहीं
बाग़ आ गया हूँ दोस्त की बातों में आ के मैं

उस दर के बंद होने का बदला लिया है दोस्त
जो बेचता रहा हूँ दरीचे बना के मैं

— Nadir Ariz

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Aanch Shayari

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