silsila sa ban gaya har shaam ke baad | सिलसिला सा बन गया हर शाम के बाद

  - Nakul kumar

सिलसिला सा बन गया हर शाम के बाद
कोई आता हैं नज़र हर जाम के बाद

क्या था अंजाम-ए-मोहब्बत का फ़साना
याद आता हैं ये तेरे नाम के बाद

काम में मसरूफ़ सहर-ओ-शाम मेरी
जीता है शायर ये सहर-ओ-शाम के बाद

ऐ नये चेहरे ठहर जा ताज़ा है ज़ख़्म
हम मिलेंगे अब मिरे आराम के बाद

खा चुका हूँ खाना ये करना हैं मैसेज
खाना खाएगी माँ इस पैग़ाम के बाद

चीख़ते क्यूँ हो अभी सरकार सरकार
वो सुनेगी तो किसी कोहराम के बाद

  - Nakul kumar

Politics Shayari

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