उस गुल-बदन का क़िस्सा सुनाती हैं तितलियाँ
जैसे कि उस हसीन की दासी हैं तितलियाँ
वो आ के मेरी ज़िंदगी को यूँॅं सजा गई
जैसे कि कोई बाग़ सजाती हैं तितलियाँ
मैं ज़िंदगी में अपनी बुला लूॅं उसे मगर
देखा है दश्त में कभी आती हैं तितलियाँ
अब इश्क़ हम को लग रहा है बोझ की तरह
फूलों ने बोलकर ये उड़ा दी हैं तितलियाँ
— Naved sahil















