ख़ुद को ऐसे तबाह कर लेंगे

इश्क़ और फिर निक़ाह कर लेंगे

आज मौका मिला है तो, लड़ ले
फिर किसी दिन सलाह कर लेंगे

सिर्फ़ तेरी ख़ुशी की ख़ातिर हम
ख़ुद पे भी इश्तिबाह कर लेंगे

छोड़ कर तुम हमें नहीं जाना
वर्ना कमरें सियाह कर लेंगे

ज़िक्र यारी में इश्क़ का जो किया
कूचा-ए-दिल रज़्म-गाह कर लेंगे

क़स्र-ए-आलीशाँ छोड़ आए तिरा
हम कहीं भी पनाह कर लेंगे

क्या ज़रूरत है चारा-गर की हमें
दर्द जब हो तो आह कर लेंगे

वस्ल का तो मुझे पता ही नहीं
हिज्र हम बे-पनाह कर लेंगे

शा'इरी मौत की हुई जिस दिन
जा के हम वाह-वाह कर लेंगे

— Nilesh Barai

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