क्या कोई ज़माने में सितमगर नहीं होता
होता है मगर आप से बढ़ कर नहीं होता
सीने से लगाता है वही अहल-ए-वफ़ा को
दिल जिस का तुम्हारी तरह पत्थर नहीं होता
ग़म आप का है मेरे लिए एक ख़ज़ाना
हर इक को ख़ज़ाना ये मुयस्सर नहीं होता
जो सूद-ओ-ज़ियाँ सोच रहा हो सर-ए-साहिल
वो बहर-ए-मोहब्बत का शनावर नहीं होता
हम गर्दिश-ए-दौराँ के सताए हुए इंसाँ
मर जाते शिवालों का जो वा दर नहीं होता
इस दौर में 'परवाज़' ख़ुदा तो है बड़ी चीज़
इंसाँ का भी दीदार मुयस्सर नहीं होता
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