मुझ को शोहरत न शान दे अल्लाह

फ़न की दौलत दे ज्ञान दे अल्लाह

सुन के पत्थर भी मोम हो जाएँ
मेरे शे'रों में जान दे अल्लाह

वक़्त के हाथ में है तीर-कमाँ
मुझ को ऊँची उड़ान दे अल्लाह

ज़ुल्म की तेज़ धूप है हर सू
सब्र का साएबान दे अल्लाह

अब ज़मीं पर नहीं जगह ख़ाली
आसमाँ पर मकान दे अल्लाह

अपने इल्ज़ाम की करूँ तरदीद
मेरे मुँह में ज़बान दे अल्लाह

आ गया ज़ीस्त से 'रफ़ीक़' आजिज़
कब तलक इम्तिहान दे अल्लाह

— Rafiq Usmani

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Parinda Shayari

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