उस के मुँह का कड़वा बोल भी कैसा था
दूध में जैसे शहद मिला हो लगता था
खुली हवा में उड़ते उड़ते मर जाना
क़फ़स में रह कर जीने से तो अच्छा था
शादी हो जाने पर बेटा भूल गया
बेवा माँ ने कैसे उस को पाला था
आज मैं उस का हाथ पकड़ कर चलता हूँ
कल जो मेरी उँगली था
में चलता था
अब तो उस में यादों का है शोर बहुत
मन का आँगन पहले कितना सूना था
सोच रहा था आप मिरे घर में कैसे
आँख खुली तो समझ में आया सपना था
दिन भर हँसता फिरता था जो सड़कों पर
वो पागल तन्हाई में अक्सर रोता था
सर को ऊँचा कर के जो चलता था 'रफ़ीक़'
अस्ल में मुझ से क़द में ज़रा वो छोटा था
— Rafiq Usmani














