ab apni rooh ke chhaalon ka kuchh hisaab karoon | अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँँ

  - Rahat Indori

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँँ
मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँँ

मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए
तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँँ

उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है
बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँँ

है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की
किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँँ

मैं करवटों के नए ज़ाइक़े लिखूँ शब-भर
ये 'इश्क़ है तो कहाँ ज़िंदगी अज़ाब करूँँ

ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही
कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँँ

  - Rahat Indori

Love Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Rahat Indori

As you were reading Shayari by Rahat Indori

Similar Writers

our suggestion based on Rahat Indori

Similar Moods

As you were reading Love Shayari Shayari