मुझे उस से कोई शिकवा नहीं होता
वो दौर-ए-हिज्र में बदला नहीं होता
तुम्हारे साथ मैं उस वक़्त था हमदम
जहाँ अपना कोई अपना नहीं होता
सितारों से नहीं फूलों से यारी है
ये रिश्ता दूर का अच्छा नहीं होता
तुम्हारी याद भी तो कम नहीं होती
कोई फिर इतना भी प्यारा नहीं होता
मैं तुम से तोड़ तो देती तअल्लुक़ भी
हमारे बीच गर बच्चा नहीं होता
As you were reading Shayari by Rudransh Trigunayat
our suggestion based on Rudransh Trigunayat
As you were reading undefined Shayari