हर एक बरगद उदास कर के हर एक संदल उदास कर के

चला गया है कोई ये सारे का सारा जंगल उदास कर के

हमें लगा था कि वो हमें ज़ख़्म अच्छे अच्छे अता करेगा
मगर हुआ ये पलट गया वो हमें तो केवल उदास कर के

ग़ुलाम हाथों को थाम बैठी थी एक शहजादी इश्क़-मारी
हज़ार रेशम उदास कर के हज़ार मख़मल उदास कर के

ये आधे आँसू ये आधी ख़ुशियाँ हम इस के क़ायल कभी नहीं थे
हमारी माने तो छोड़ दीजे हमें मुकम्मल उदास कर के

हमारे बस में नहीं है वरना ये रौनक़ें और ये शोर सारा
ख़मोश कर देते सारी दुनिया ये सारी हलचल उदास कर के

सड़क ने उस को शदीद रोका गली ने उस को बहुत पुकारा
वो जाने वाला चला गया है तमाम सिग्नल उदास कर के

— Saad Ahmad

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