har ek bargad udaas kar ke har ek sandal udaas karke | हर एक बरगद उदास कर के हर एक संदल उदास करके

  - Saad Ahmad

हर एक बरगद उदास कर के हर एक संदल उदास करके
चला गया है कोई ये सारे का सारा जंगल उदास करके

हमें लगा था कि वो हमें ज़ख़्म अच्छे अच्छे अता करेगा
मगर हुआ ये पलट गया वो हमें तो केवल उदास करके

ग़ुलाम हाथों को थाम बैठी थी एक शहजादी इश्क़-मारी
हज़ार रेशम उदास करके हज़ार मखमल उदास करके

ये आधे आँसू ये आधी ख़ुशियाँ हम इसके क़ायल कभी नहीं थे
हमारी माने तो छोड़ दीजे हमें मुकम्मल उदास करके

हमारे बस में नहीं है वरना ये रौनक़ें और ये शोर सारा
ख़मोश कर देते सारी दुनिया ये सारी हलचल उदास करके

सड़क ने उसको शदीद रोका गली ने उसको बहुत पुकारा
वो जाने वाला चला गया है तमाम सिग्नल उदास करके

  - Saad Ahmad

Udasi Shayari

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