ग़म में मज़ीद अपने इज़ाफ़ा न कीजिए

जो जा चुके हैं उन को पुकारा न कीजिए

बर्बाद कर ही लेंगें मुकम्मल ही बख़्त को
हरदम गुज़िश्ता वक़्त को सोचा न कीजिए

कुमलाह गई हैं कलियाँ भी इस दिल के बाग़ की
फ़ुर्क़त में इनका हाल तो ख़स्ता न कीजिए

कन्धा मिरा हमेशा मुयस्सर है आप को
तन्हाई में यूँ रातों को रोया न कीजिए

मुश्किल-ज़दा न आप को मुश्किल में डाल दे
हर डूबते को हाथ थमाया न कीजिए

नश्तर से तेज़ आप की चुभती है बेरुख़ी
यूँ ख़्वाह-म-ख़्वाह लहजे को बदला न कीजिए

अब गिर चुका है हर कोई मेआ'र से सना
बिन सोचे सबकी बातों में आया न कीजिए

— Sana Hashmi

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