ख़ुद को उल्फ़त में ख़्वार करती रही

अपना दिल बे-क़रार करती रही

बारहा उस को प्यार करती रही
ये ख़ता बार बार करती रही

था ये मालूम वो न आएगा
फिर भी मैं इन्तिज़ार करती रही

ज़ख़्म दिल के कहीं न भर जाएँ
इस लिए उनपे वार करती रही

बन गया जान का मिरी दुश्मन
जिस पे मैं जाँ निसार करती रही

बे-सबब दोस्तों से दुश्मन से
मैं उसे होशियार करती रही

उस के लहजे की सर्द-महरी पर
ख़ुद को मैं इंकसार करती रही

मेरी आँखें तो झील जैसी थीं
क्यूँ इन्हें अश्कबार करती रही

फिर 'सना' भूली बिसरी यादों को
ज़ेहन-ओ-दिल पर सवार करती रही

— Sana Hashmi

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