ख़ुद से कुढ़ते हुए तिलमिलाते हुए
थक गए ज़िन्दगी हम बिताते हुए
उम्र इक लग गई अक़्ल आते हुए
बे-सबब ठोकरें मुझ को खाते हुए
दोस्तों और मुख़ालिफ में फ़र्क अब नहीं
ज़ख़्म देते हैं सब मुस्कुराते हुए
इज़्ज़त-ए-नफ़्स भी और अना भी गई
मिट गए हम तअल्लुक़ निभाते हुए
जल रहा था जो दिल में दिया इश्क़ का
बुझ गई हूँ उसे मैं बुझाते हुए
हो गई अब मुहब्बत से नफ़रत मुझे
ख़ुद को देखा है जब गिड़गिड़ाते हुए
दर्द-ए-दिल मैं ने जिस पे किया है अयाँ
उस ने सोचा नहीं दिल दुखाते हुए
बेड़ियाँ काट डाली हैं ख़ुद पाँव की
चल रही हूँ मैं अब लड़खड़ाते हुए
अब न जाने 'सना' आ गई है कहाँ
रास्ता दूसरों को दिखाते हुए
— Sana Hashmi















