मुझ सा न मिल सका मुझे इस दो जहान में

दो तेग कैसे रहती भला इक मियान में

क्यूँ आज रेंगने पे वो मजबूर हो चला
कल तक जो उड़ रहा था खुले आसमान में

औक़ात ज़र्रा भर भी नहीं अस्ल में मगर
जाने ये लोग जीते हैं किस किस गुमान में

उकता के रह गई थी जो पलभर के साथ से
यादों के संग रहती है ख़ाली मकान में

ये जिस्म की थकान भी कोई थकान है
इंसान घुलता जा रहा ज़ेहनी थकान में

अंजाम उस कहानी का नाशाद ही रहा
किरदार मर गया मिरा जिस दास्तान में

सुनिए कभी भी रहता नहीं एक जैसा वक़्त
बाद-ए-सबा ये कह गई चुपके से कान में

नफ़रत का बीज दिल में सियासत ने बो दिया
रहना मुहाल हो गया हिन्दोस्तान में

लो आप हक़-बयानी से बेज़ार हो गए
काँटे लगे हुए हैं सना की ज़बान में

— Sana Hashmi

More by Sana Hashmi

Other ghazal from the same pen

See all from Sana Hashmi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling