रंज-ओ-ग़म से ही रही अपनी शनासाई भी
हौसलों की हुई है ख़त्म तवानाई भी
जिन वफ़ादारों ने धोखे ही फ़क़त खाए थे
उन को ही मिलती रही ज़िल्लत-ए-रुस्वाई भी
बेवफ़ाओं के ही दीवाने बनें हैं आशिक़
मिल गई ख़ाक में किरदार की ज़ेबाई भी
देखना बोलना लगता है फ़िज़ूल अब मुझ को
छिन गई कुव्वत-ए-बीनाई भी गोयाई भी
झाँक कर देखती हूँ शोर में अपने अंदर
मैं तमन्नाई भी हूँ और तमाशाई भी
मकड़ी के जाल से कमज़ोर सहारे हैं सभी
इन के बस में कहाँ है करना मसीहाई भी
मैं तो अपनों से मज़म्मत भी नहीं कर पाई
और सितम करते रहे मुझ पे ये हरजाई भी
ज़ख़्म इस दिल के मुहब्बत ही भरेगी लेकिन
हम से होने की नहीं इस की पज़ीराई भी
अपनी दिलजोई को अब कोई न आएगा सना
अच्छी अब लगने लगी है हमें तन्हाई भी















