अपने मतलब को मोहब्बत कहते हैं
लोग ऐसे कब किसी के होते हैं
हँसने से जिन के सवेरा होता था
आजकल वो ख़ुद भी रो के सोते हैं
जिन से मिलना रोज़ होता था कभी
अब वही पर्दों में ख़ुद को रखते हैं
वो मुसाफ़िर फिर मुसाफ़िर ही नहीं
वो जो मंज़िल से मोहब्बत करते हैं
काटते हैं शाखों को बेरहम जो
पूछते भी हैं शजर क्यूँ रोते हैं
दर्द अपना कह न पाए जो 'शफ़क़'
इश्क़ के अश'आर अब वो कहते हैं
— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"















