"माँ"
घर में माँ हो तो घर घर लगता है
बिन माँ के जीना दूभर लगता है
माँ का आँचल मीठी छाँव शजर की
जो न हो तो जीवन बंजर लगता है
तेरे होते फूलों का आंगन था
और अब पाँव में पत्थर लगता है
जब तू थी तो सारा जग अपना था
पर अब इन अपनो से डर लगता है
— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"















