मिला ज़ख़्म है जो सहा भी न जाए
मोहब्बत है कितनी कहा भी न जाए
हुए सूख कर के हैं पत्थर नयन में
मेरे आँसुओं से बहा भी न जाए
न मिलते मुझे हो न होते जुदा हो
ये सच है कि तुम से रहा भी न जाए
हुई मौत है हम सफ़र ज़िंदगी की
अब क्या छोड़ के ये जहाँ भी न जाए
ख़ता तो नहीं है मोहब्बत में मरना
यूँ मर के ख़ुदा के यहाँ भी न जाए
— Sandeep Gandhi Nehal















