ग़मों के ये बादल बरसते रहेंगे
मोहब्बत की ख़ातिर तरसते रहेंगे
मेरे अश्क बन के वफ़ाओं के मोती
यूँ आँखों से मेरी छलकते रहेंगे
अगर जो मिरे आप हो ना सकें तो
यहाँ से वहाँ हम भटकते रहेंगे
भले ही जलेंगे भले ही मरेंगे
सुनो आप ख़ातिर तड़पते रहेंगे
कमी से तुम्हारी करें ख़ुद-कुशी गर
तो हर रोज़ फाँसी लटकते रहेंगे
— Sandeep Gandhi Nehal















