सहने में अब दुश्वारी है
यूँ ग़म मेरा सरकारी है
हाँ कुछ यारी मक्कारी है
औ कहते ये हुश्यारी है
अपनी भी कोई दुनिया है
अपनी भी दुनिया दारी है
प्रेम सरस में जीना सीखा
औ जीना उस
में जारी है
चलते चलते थक जाता हूँ
बस थोड़ी जिम्मेदारी है
हर दिन तुम
में ही जीता हूँ
यार यही इक बीमारी है
तन मन जीवन सब नश्वर है
बस मरने की तैयारी है
— Suraj "pathik"















