jab bhi maut hamaari khwaahish door kinaare karti hai | जब भी मौत हमारी ख़्वाहिश दूर किनारे करती है

  - SWAPNIL YADAV 'NIL'

जब भी मौत हमारी ख़्वाहिश दूर किनारे करती है
तब दुनिया हो होकर साधू खूब ख़सारे करती है

ये ख़िदमतगारी है मेरी इस दुनिया की महफ़िल में
मैं अंधा हूँ पर ये दुनिया खूब शरारे करती है

कहने वाले कहते हैं ये दुनिया है रंगीन बहुत
एक ख्वाहिश-ए-क़ज़ा है जो बर्बाद नज़ारे करती है

दोनों हाथों से ये धड़कन खूब दबा हम लेते हैं
जैसे ही तक़दीर कभी नज़दीक तुम्हारे करती है

हम लेटे रहते हैं पीकर कितने जाम उदासी के
इक साक़ी-सी दुनिया आगे रक़्स हमारे करती है

जब भी मौत का बोसा आकर साँस उड़ाने लगता है
तब तब दुनिया भी दूरी से शोख़ इशारे करती है

  - SWAPNIL YADAV 'NIL'

Qismat Shayari

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