कोई बतलाए उसकी बात हमें
वो जो कहता था कायनात हमें
पहले हम रात काट लेते थे
और अब काटती है रात हमें
हम ने वो बात भी समझ ली है
जो समझनी नहीं थी बात हमें
वरना हम लाश हैं मुकम्मल लाश
ज़िंदा रखते हैं हादसात हमें
औलिया में शुमार होते हम
रोक लेती हैं ख़्वाहिशात हमें
चाह कर इन बदन-सलाखों से
हम पे जाइज़ नहीं नजात हमें
हम हैं दीमक-ज़दा दरख़्त की ख़ाक
काट सकते हैं काग़ज़ात हमें
ये जो ग़ज़लें हमारी हैं शादाब
ले न डूबें ये काफ़िरात हमें
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