ye jo izhaar karna hota hai | ये जो इज़हार करना होता है

  - Shahid Zaki

ये जो इज़हार करना होता है
कार-ए-बे-कार करना होता है

क़ब्र वो नाव है कि जिस में हमें
आसमाँ पार करना होता है

ख़ाल-ओ-ख़दस गुरेज़ करना भी
लम्स बेदार करना होता है
'इश्क़ वो कार-ए-यक-ब-यक है जिसे
मरहला-वार करना होता है

अपने अंदर ख़ला-पुरी के लिए
ख़ुद को मिस्मार करना होता है

हम पस-ए-दार सीख आते हैं
जो सर-ए-दार करना होता है

कितना आसाँ है सोचना 'शाहिद'
कितना दुश्वार करना होता है

  - Shahid Zaki

Education Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shahid Zaki

As you were reading Shayari by Shahid Zaki

Similar Writers

our suggestion based on Shahid Zaki

Similar Moods

As you were reading Education Shayari Shayari