ये जो इज़हार करना होता है
कार-ए-बे-कार करना होता है
क़ब्र वो नाव है कि जिस में हमें
आसमाँ पार करना होता है
ख़ाल-ओ-ख़दस गुरेज़ करना भी
लम्स बेदार करना होता है
'इश्क़ वो कार-ए-यक-ब-यक है जिसे
मरहला-वार करना होता है
अपने अंदर ख़ला-पुरी के लिए
ख़ुद को मिस्मार करना होता है
हम पस-ए-दार सीख आते हैं
जो सर-ए-दार करना होता है
कितना आसाँ है सोचना 'शाहिद'
कितना दुश्वार करना होता है
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