इश्क़ में जाने कितने धोखे खाए हैं
न जाने ये सब कहाँ-कहाँ से आए हैं
तन्हाई में तन्हा अक्सर सोचता हूँ
वो लोग कौन हैं जो इस को भाए हैं
जो-जो बोला उस ने मैं ने वो सब किया
फिर क्यूँ बिगड़े ये चाहत के साए हैं
देकर उन्हें ये ख़ुशियाँ सारी गुलाब की
अब तो बस हमें काँटे ही मिल पाए हैं
लोगों ने ऐसे देखा घूरकर मुझे
मानो जैसे हम ने ही ज़ुल्म ढाए हैं
क्या ही क़सूर होगा उन की आरज़ू का
दीवानगी के गीत तो हम ने गाए हैं
मानूँ बे-वफ़ा या मानूँ अपनी तक़दीर
मेरे सितारे बस गर्दिश में छाए हैं
— Shaikh Arhan















