जो है दिल के क़रीब और मुझ सेे दूर, मेरा था
मैं जानता हूँ कि बिछड़ने में भी क़ुसूर मेरा था
रश्क खाता था जमाना देख कर एक साथ हमें
मैं क्या था उस का पता नहीं, वो ग़ुरूर मेरा था
उस ने मौका ही ना दिया मुझे कुछ समझाने का
बहुत जल्दी में था ना जो वो ना-सुबुर मेरा था
उस से कैसा गिला जिस ने इश्क़ समझा ही नहीं
उस के इश्क़ में फ़ना होने का फितूर मेरा था
सुना है ख़ुश वो भी नहीं जुदा होकर "निहार"
सुकून ये कि उस के चेहरे पर फैला नूर मेरा था
— Shashank Tripathi















