"मुझ सेे बिछड़ना तेरी मजबूरी सही"
मुझ से बिछड़ना तेरी मजबूरी सही
कुछ भी नहीं तो मीलों की दूरी सही
किस ने कहा तर्के वफ़ा करते है हम
कब ये कहा तुझ को जुदा करते है हम
अपना नहीं अब मैं भी तुम भी गैर हो
अब जो हुआ छोड़ो भी आगे ख़ैर हो
रश्मो - वफ़ा अब ये भी ज़रूरी ही सही
मुझ से बिछड़ना तेरी मजबूरी सही
ये भी सितम के बावफ़ा हो तुम बहुत
ये भी गिला की तुम किसी के हो गए
मैं ख़्वाब तुम्हारे सजाता रह गया
पर ख़्वाब मेरे सब किसी के हो गए
लौटोगे तुम ये आस अब भी बाकी है
जाँ जा चुकी है साँस अब भी बाकी है
अपनी कहानी फिर कभी पूरी सही
मुझ से बिछड़ना तेरी मजबूरी सही
— karan singh rajput















