सभी कुछ सामने है हाँ मगर सच्चा नहीं लगता
ना जाने क्यूँ मुझे कुछ भी यहाँ अपना नहीं लगता
था मैं जब अपने घर में तो सुकूँ की नींद आती थी
कि घर दूजा मुझे क्यूँ कोई घर जैसा नहीं लगता
नए इस शहर में हैं लोग इतने दिल लगाने को
लगा होगा किसी का दिल मगर मेरा नहीं लगता
नहीं भाते मुझे इनके नक़ाबों से ढके चेहरे
निगाहें सुर्ख़ हैं पर कोई भी प्यासा नहीं लगता
अगर तुमको बताऊँ सच कि है क्या कश्मकश यारों
ना हो जो बात उन सेे तो वो दिन अच्छा नहीं लगता
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