हर तरफ़ शोर है इंसान मगर तन्हा है
इस नए दौर का हर चेहरा बड़ा सहमा है
जिस को सच कहना था वो बिक गया बाज़ारों में
अब क़लम वाले के हाथों में ही तो सौदा है
भूख गलियों में सिसकती रही रातों की तरह
और महलों में सियासत का नया जलसा है
धर्म के नाम पे नफ़रत का धुआँ फैला है
आदमी आज भी इंसान से क्यों डरता है
जिस्म मिट्टी का सही सोच तो ऊँची होती
आज हर शख़्स यहाँ सोच से ही छोटा है
भीड़ ख़ामोश है ज़ालिम को सहारा देकर
ये तमाशा भी मेरे दौर का इक हिस्सा है
इल्म बढ़ता गया किरदार मगर गिरता गया
आज तहज़ीब के चेहरे पे अजब धब्बा है
— Shreesh Mishra















