"जनम-दिन"
ये दिन बारहा रोज़ आता नहीं है
दुआएँ कोई रोज़ पाता नहीं है
ये कार-ए-जहाँ रोज़ होते रहेंगे
फ़क़त तुम यहीं तक न महदूद रहना
उदासी की चादर उड़ा दो हवा में
ज़रा देर खुल कर जियो तो सही तुम
मोहब्बत की आँखों से देखो घड़ी भर
तुम्हारी तरह ही हैं सब ख़ूब-सूरत
निगाहों से अपनी न आँसू बहाना
ज़माने में रह कर के जीना दिखाना
ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम भूल जाना
ख़ुशी से तुम अपना जनम-दिन मनाना
— Sohil Barelvi















