किसी के वास्ते जीता है अब न मरता है

हर आदमी यहाँ अपना तवाफ़ करता है

सब अपनी अपनी निगाहें समेट लेते हैं
वो ख़ुश-लिबास सर-ए-शाम जब बिखरता है

मैं जिस की राह में हर शब दिए जलाता हूँ
वो माहताब ज़मीं पर कहाँ उतरता है

हमारा दिल भी है वीराँ हवेलियों की तरह
तमाम रात यहाँ कोई आह भरता है

मैं उस के नक़्श-ए-कफ़-ए-पा भी छू नहीं सकता
वो तेज़-गाम हवाओं के पर कतरता है

न बाम-ए-आरज़ू रौशन न साएबान-ए-तलब
सरा-ए-दिल में कहाँ कोई अब ठहरता है

सब अपने आप से ख़ाइफ़ हैं इन दिनों 'अख़्तर'
हर एक शख़्स यहाँ आइने से डरता है

— Sultan Akhtar

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