इश्क़ क़स्दन किया नहीं जाता
दिल भी क़स्दन दिया नहीं जाता
हम ने आब-ए-हयात जाना था
ये हलाहल पिया नहीं जाता
जिस्म-ए-ज़िंदाँ में रूह क़ैदी है
इस घुटन में जिया नहीं जाता
साँस लेने में भी थकन है अब
ज़ख़्म-ए-दिल अब सिया नहीं जाता
है गला दिल-ख़राश चीख़ों से
मातम-ए-दिल किया नहीं जाता
कैसे लफ़्ज़ों में ग़म नज़र आए
ख़ाका-ए-ग़म लिखा नहीं जाता
'सहर' आँखों में है वो तुग़्यानी
ये समुंदर पिया नहीं जाता
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