कैसे कैसे ख़्वाब दिखाती हैं आँखें

और फिर मुझ को रोज़ जगाती हैं आँखें

ऐसे तो ये राज़ समझना मुश्किल है
कैसे सारे राज़ बताती हैं आँखें

जिन बातों में अक्सर सदियाँ लगती हैं
उन को लम्हों में समझाती हैं आँखें

मैं तो थक के अक्सर सो ही जाता हूँ
बा'द मेरे तन्हा हो जाती हैं आँखें

मेरी आँखों में इक ख़ून का दरया है
क़तरा क़तरा रोज़ बहाती हैं आँखें

— Tariq Faiz

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