हाल-ए-दिल ही बयाँ नहीं होता
वरना ये दर्द-ए-जाँ नहीं होता
ऐसा लगता है शहर जंगल है
जब कोई हम-ज़ुबाँ नहीं होता
ढूँढ़ने वाले थक गए आख़िर
वो जहाँ है वहाँ नहीं होता
चाहे गहरा बहुत लगा हो मगर
ज़ख़्म-ए-दिल का निशाँ नहीं होता
— Tariq Faiz
वरना ये दर्द-ए-जाँ नहीं होता
ऐसा लगता है शहर जंगल है
जब कोई हम-ज़ुबाँ नहीं होता
ढूँढ़ने वाले थक गए आख़िर
वो जहाँ है वहाँ नहीं होता
चाहे गहरा बहुत लगा हो मगर
ज़ख़्म-ए-दिल का निशाँ नहीं होता
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