हज़ारों शे'र मेरे पहले तार-तार हुए
फिर उस के बा'द जो निकले वो शाहकार हुए
जो तुझ को पाने की ख़ातिर थे बे-क़रार बहुत
वो तुझ को पा के भी किस दर्जा बे-क़रार हुए
इक आईने को मैं बस आइना समझता था
मगर वो टूटा तो हिस्से मेरे हज़ार हुए
न मुझ से कोई शिकायत न और कोई गिला
वो मुझ से ऐसे ख़फा यार पहली बार हुए
किसी ने देखा नहीं और ज़ख़्म गहरा भी
बड़ी सफ़ाई से तुम मेरे आर-पार हुए
कहीं भी जाऊँ तो लगता है तुम हो साथ मेरे
दिल ओ दिमाग़ पे इस तरह तुम सवार हुए
— Tariq Faiz















