hazaaron she'r mere pahle taar-taar hue | हज़ारों शे'र मेरे पहले तार-तार हुए

  - Tariq Faiz

हज़ारों शे'र मेरे पहले तार-तार हुए
फ़िर उसके बाद जो निकले वो शाहकार हुए

जो तुझको पाने की ख़ातिर थे बे-क़रार बहुत
वो तुझको पा के भी किस दर्जा बे-क़रार हुए

इक आईने को मैं बस आइना समझता था
मगर वो टूटा तो हिस्से मेरे हज़ार हुए

न मुझ सेे कोई शिकायत न और कोई गिला
वो मुझ सेे ऐसे ख़फा यार पहली बार हुए

किसी ने देखा नहीं और ज़ख्म गहरा भी
बड़ी सफाई से तुम मेरे आर-पार हुए

कहीं भी जाऊँ तो लगता है तुम हो साथ मेरे
दिल ओ दिमाग़ पे इस तरह तुम सवार हुए

  - Tariq Faiz

Teer Shayari

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