shaitaan ke dil par chalta hoon seenon mein safar karta hoonus aankh ka kya bachta hai mai jis aankh mein ghar karta hoon | शैतान के दिल पर चलता हूं सीनों में सफर करता हूं

  - Tehzeeb Hafi

शैतान के दिल पर चलता हूं सीनों में सफर करता हूं
उस आंख का क्या बचता है मै जिस आंख में घर करता हूं

जो मुझ में उतरे हैं उनको मेरी लहरों का अंदाजा है
दरियाओ में उठता बैठता हूं सैलाब बसर करता हूं

मेरी तन्हाई का बोझ तुम्हारी बिनाई ले डूबेगा
मुझे इतना करीब से मत देखो आंखों पर असर करता हूं

  - Tehzeeb Hafi

Wahshat Shayari

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    Daqiiq Jabaali

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As you were reading Shayari by Tehzeeb Hafi

    पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा
    मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा

    अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया
    अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा

    फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन
    मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा

    गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ
    नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा

    मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ
    तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा

    तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख
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    मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर
    और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा
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    Tehzeeb Hafi
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    तारीकियों को आग लगे और दिया जले
    ये रात बैन करती रहे और दिया जले

    उस की ज़बाँ में इतना असर है कि निस्फ़ शब
    वो रौशनी की बात करे और दिया जले

    तुम चाहते हो तुम से बिछड़ के भी ख़ुश रहूँ
    या'नी हवा भी चलती रहे और दिया जले

    क्या मुझ से भी अज़ीज़ है तुम को दिए की लौ
    फिर तो मेरा मज़ार बने और दिया जले

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    मैं चाहता हूँ शाम ढले और दिया जले

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    Tehzeeb Hafi
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    नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा
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    तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं
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    Tehzeeb Hafi
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    कितनी रातें काट चुका हूँ पर वो वस्ल का दिन
    इस दरिया से पहले कितने जंगल आते हैं

    हमें तो नींद भी आती है तो आधी आती है
    वो कैसे हैं जिनको ख़्वाब मुकम्मल आते हैं

    इस रस्ते पर पेड़ भी आते हैं उसने पूछा
    जल कर ख़ुशबू देने वाले संदल आते हैं

    कौन है जो इस दिल में ख़ामोशी से उतरेगा
    देखो इस आवाज़ पे कितने पागल आते हैं

    इक से भड़ कर एक सवारी अस्प-औ-फील भी है
    जाने क्यों हम तेरी ज़ानिब पैदल आते हैं
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    Tehzeeb Hafi
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    कुछ ज़रूरत से कम किया गया है
    तेरे जाने का ग़म किया गया है

    ता-क़यामत हरे भरे रहेंगे
    इन दरख़्तों पे दम किया गया है

    इस लिए रौशनी में ठंडक है
    कुछ चराग़ों को नम किया गया है

    क्या ये कम है कि आख़िरी बोसा
    उस जबीं पर रक़म किया गया है

    पानियों को भी ख़्वाब आने लगे
    अश्क दरिया में ज़म किया गया है

    उन की आँखों का तज़्किरा कर के
    मेरी आँखों को नम किया गया है

    धूल में अट गए हैं सारे ग़ज़ाल
    इतनी शिद्दत से रम किया गया है
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    Tehzeeb Hafi
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