शैतान के दिल पर चलता हूँ सीनों में सफ़र करता हूँ
उस आँख का क्या बचता है मैं जिस आँख में घर करता हूँ
जो मुझ में उतरे हैं उन को मेरी लहरों का अंदाज़ा है
दरियाओ में उठता बैठता हूँ सैलाब बसर करता हूँ
मेरी तन्हाई का बोझ तुम्हारी बिनाई ले डूबेगा
मुझे इतना क़रीब से मत देखो आँखों पर असर करता हूँ
— Tehzeeb Hafi















