RAAHI
RAAHI
Ghazal

उम्र गुज़रेगी अब तीरगी में

काफ़ी बेचैनी है रौशनी में

साल ये भी अकेले बिताया
वो नहीं आई दीपावली में

ख़त्म कर इश्क़-ओ-रब्त-ओ-त'अल्लुक़
याद ही बस बची ज़िंदगी में

इश्क़ ख़ातिर कमाना पड़ेगा
क्या रखा है यहाँ शा'इरी में

दोस्त तक याद नइँ करते अब तो
कौन ही साथ दे मुफ़्लिसी में

ज़िंदगी भर कमाई जो इज़्ज़त
खो दी है महज़ इक दिल-लगी में

तजरबा कह रहा सब को 'राही'
मत यक़ीं कीजिए आशिक़ी में

— RAAHI

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