बहुत हुआ इंतिज़ार अब शे'र थक चुका है
सफ़र में उस तक के एक मिसरा अटक चुका है
वो राहबर मंज़िलों से वाक़िफ़ नहीं ज़ियादा
वो आपसे हम से बस ज़ियादा भटक चुका है
लहू बहेगा तो सर की जानिब बहेगा अब से
तेरा ये दरवेश छत से उल्टा लटक चुका है
किसे बचाएँ इशारे पे उस के नाचने से
हमारा ही एक पैर देखो थिरक चुका है
उस एक कुर्ते को हम ने झाड़ा तो ख़ूब लेकिन
अनन्त फ़ानी का जिस्म उस से चिपक चुका है
— Ananth Faani















